Ad

dairy farming

सावधान : बढ़ती गर्मी में इस तरह करें अपने पशुओं की देखभाल

सावधान : बढ़ती गर्मी में इस तरह करें अपने पशुओं की देखभाल

फिलहाल गर्मी के दिन शुरू हो गए हैं। आम जनता के साथ-साथ पशुओं को भी गर्मी प्रभावित करेगी। ऐसे में मवेशियों को भूख कम और प्यास ज्यादा लगती है। पशुपालक अपने मवेशियों को दिन में न्यूनतम तीन बार जल पिलाएं। 

जिससे कि उनके शरीर को गर्म तापमान को सहन करने में सहायता प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त लू से संरक्षण हेतु पशुओं के जल में थोड़ी मात्रा में नमक और आटा मिला देना चाहिए। 

भारत के विभिन्न राज्यों में गर्मी परवान चढ़ रही है। इसमें महाराष्ट्र राज्य सहित बहुत से प्रदेशों में तापमान 40 डिग्री पर है। साथ ही, गर्म हवाओं की हालत देखने को मिल रही है। साथ ही, उत्तर भारत के अधिकांश प्रदेशों में तापमान 35 डिग्री तक हो गया है। 

इस मध्य मवेशियों को गर्म हवा लगने की आशंका रहती है। लू लगने की वजह से आम तौर पर पशुओं की त्वचा में सिकुड़न और उनकी दूध देने की क्षमता में गिरावट देखने को मिलती है। 

हालात यहां तक हो जाते हैं, कि इसके चलते पशुओं की मृत्यु तक हो जाने की बात सामने आती है। ऐसी भयावय स्थिति से पशुओं का संरक्षण करने के लिए उनकी बेहतर देखभाल करना अत्यंत आवश्यक है।

पशुओं को पानी पिलाते रहें

गर्मी के दिनों में मवेशियों को न्यूनतम 3 बार जल पिलाना काफी आवश्यक होता है। इसकी मुख्य वजह यह है, कि जल पिलाने से पशुओं के तापमान को एक पर्याप्त संतुलन में रखने में सहायता प्राप्त होती है। 

इसके अतिरिक्त मवेशियों को जल में थोड़ी मात्रा में नमक और आटा मिलाकर पिलाने से गर्म हवा लगने की आशंका काफी कम रहती है। 

ये भी देखें: इस घास के सेवन से बढ़ सकती है मवेशियों की दुग्ध उत्पादन क्षमता; 10 से 15% तक इजाफा संभव 

यदि आपके पशुओं को अधिक बुखार है और उनकी जीभ तक बाहर निकली दिख रही है। साथ ही, उनको सांस लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुंह के समीप झाग निकलते दिखाई पड़ रहे हैं तब ऐसी हालत में पशु की शक्ति कम हो जाती है। 

विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे हालात में अस्वस्थ पशुओं को सरसों का तेल पिलाना काफी लाभकारी साबित हो सकता है। सरसों के तेल में वसा की प्रचूर मात्रा पायी जाती है। जिसकी वजह से शारीरिक शक्ति बढ़ती है। विशेषज्ञों के अनुरूप गाय और भैंस के पैदा हुए बच्चों को सरसों का तेल पिलाया जा सकता है।

पशुओं को सरसों का तेल कितनी मात्रा में पिलाया जाना चाहिए

सीतापुर जनपद के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ आनंद सिंह के अनुरूप, गर्मी एवं लू से पशुओं का संरक्षण करने के लिए काफी ऊर्जा की जरूरत होती है। ऐसी हालत में सरसों के तेल का सेवन कराना बेहद लाभकारी होता है। 

ऊर्जा मिलने से पशु तात्कालिक रूप से बेहतर महसूस करने लगते हैं। हालांकि, सरसों का तेल पशुओं को प्रतिदिन देना लाभकारी नहीं माना जाता है। 

डॉ आनंद सिंह के अनुसार, पशुओं को सरसों का तेल तभी पिलायें, जब वह बीमार हों अथवा ऊर्जा स्तर निम्न हो। इसके अतिरिक्त पशुओं को एक बार में 100 -200 ML से अधिक तेल नहीं पिलाना चाहिए। 

हालांकि, अगर आपकी भैंस या गायों के पेट में गैस बन गई है, तो उस परिस्थिति में आप अवश्य उन्हें 400 से 500 ML सरसों का तेल पिला सकते हैं। 

साथ ही, पशुओं के रहने का स्थान ऐसी जगह होना चाहिए जहां पर प्रदूषित हवा नहीं पहुँचती हो। पशुओं के निवास स्थान पर हवा के आवागमन के लिए रोशनदान अथवा खुला स्थान होना काफी जरुरी है।

पशुओं की खुराक पर जोर दें

गर्मी के मौसम में लू के चलते पशुओं में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है। उनको इस बीच प्रचूर मात्रा में हरा एवं पौष्टिक चारा देना अत्यंत आवश्यक होता है। 

हरा चारा अधिक ऊर्जा प्रदान करता है। हरे चारे में 70-90 फीसद तक जल की मात्रा होती है। यह समयानुसार जल की आपूर्ति सुनिश्चित करती है। इससे पशुओं की दूध देने की क्षमता काफी बढ़ जाती है।

बन्नी नस्ल की भैंस देती है 15 लीटर दूध, जानिए इसके बारे में

बन्नी नस्ल की भैंस देती है 15 लीटर दूध, जानिए इसके बारे में

बन्नी भैंस पाकिस्तान के सिंध प्रान्त की किस्म है, जो भारत में गुजरात प्रांत में दुग्ध उत्पादन के लिए मुख्य रूप से पाली जाती है। बन्नी भैंस का पालन गुजरात के सिंध प्रांत की जनजाति मालधारी करती है। जो दूध की पैदावार के लिए इस जनजाति की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। बन्नी नस्ल की भैंस गुजरात राज्य के अंदर पाई जाती है। गुजरात राज्य के कच्छ जनपद में ज्यादा पाई जाने की वजह से इसे कच्छी भी कहा जाता है। यदि हम इस भैंस के दूसरे नाम ‘बन्नी’ के विषय में बात करें तो यह गुजरात राज्य के कच्छ जनपद की एक चरवाहा जनजाति के नाम पर है। इस जनजाति को मालधारी जनजाति के नाम से भी जाना जाता है। यह भैंस इस समुदाय की रीढ़ भी कही जाती है।

भारत सरकार ने 2010 में इसे भैंसों की ग्यारहवीं अलग नस्ल का दर्जा हांसिल हुआ

बाजार में इस भैंस की कीमत 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक है। यदि इस भैंस की उत्पत्ति की बात की जाए तो यह भैंस पाकिस्तान के सिंध प्रान्त की नस्ल मानी जाती है। मालधारी नस्ल की यह भैंस विगत 500 सालों से इस प्रान्त की मालधारी जनजाति अथवा यहां शासन करने वाले लोगों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण पशुधन के रूप में थी। पाकिस्तान में अब इस भूमि को बन्नी भूमि के नाम से जाना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि भारत के अंदर साल 2010 में इसे भैंसों की ग्यारहवीं अलग नस्ल का दर्जा हांसिल हुआ था। इनकी शारीरिक विशेषताएं अथवा
दुग्ध उत्पादन की क्षमता भी बाकी भैंसों के मुकाबले में काफी अलग होती है। आप इस भैंस की पहचान कैसे करें।

ये भी पढ़ें:
अब खास तकनीक से पैदा करवाई जाएंगी केवल मादा भैंसें और बढ़ेगा दुग्ध उत्पादन

बन्नी भैंस की कितनी कीमत है

दूध उत्पादन क्षमता के लिए पशुपालकों में प्रसिद्ध बन्नी भैंस की ज्यादा कीमत के कारण भी बहुत सारे पशुपालक इसे खरीद नहीं पाते हैं। आपको बता दें एक बन्नी भैंस की कीमत 1 लाख रुपए से 3 लाख रुपए तक हो सकती है।

बन्नी भैंस की क्या खूबियां होती हैं

बन्नी भैंस का शरीर कॉम्पैक्ट, पच्चर आकार का होता है। इसके शरीर की लम्बाई 150 से 160 सेंटीमीटर तक हो होती है। इसकी पूंछ की लम्बाई 85 से 90 सेमी तक होती है। बतादें, कि नर बन्नी भैंसा का वजन 525-562 किलोग्राम तक होता है। मादा बन्नी भैंस का वजन लगभग 475-575 किलोग्राम तक होता है। यह भैंस काले रंग की होती है, लेकिन 5% तक भूरा रंग शामिल हो सकता है। निचले पैरों, माथे और पूंछ में सफ़ेद धब्बे होते हैं। बन्नी मादा भैंस के सींग ऊर्ध्वाधर दिशा में मुड़े हुए होते हैं। साथ ही कुछ प्रतिशत उलटे दोहरे गोलाई में होते हैं। नर बन्नी के सींग 70 प्रतिशत तक उल्टे एकल गोलाई में होते हैं। बन्नी भैंस औसतन 6000 लीटर वार्षिक दूध का उत्पादन करती है। वहीं, यह प्रतिदिन 10 से 18 लीटर दूध की पैदावार करती है। बन्नी भैंस साल में 290 से 295 दिनों तक दूध देती है।
डेयरी पशुओं में हरे चारे का महत्व

डेयरी पशुओं में हरे चारे का महत्व

पशुपालन पर होने वाली कुल लागत का लगभग 60 प्रतिशत व्यय पशु आहार पर होता है। इसलिए पशुपालन व्यवसाय की सफलता प्रमुख रूप से पशु आहार पर होने वाले खर्च पर निर्भर करती है। पशु आहार में स्थानीय रूप से उपलब्ध पशु आहार के घटकों एवं हरे चारे का प्रयोग करने से पशु आहार की लागत को कम किया जा सकता है, और पशुपालन व्यवसाय से अधिकाधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शारीरिक विकास, प्रजनन तथा दूध उत्पादन हेतु आवश्यक पोषक तत्वों को सही मात्रा एवं उचित अनुपात में देना अत्यन्त आवश्यक है। भारतवर्श में पशुओं का पोषण प्रमुख रूप में कृषि उपज तथा फसलों के चक्र पर निर्भर करता है। हरा चारा पशु आहार का एक अभिन्न अंग है। 

हरा चारा पशुओं के लिए सस्ते प्रोटीन व शक्ति का मुख्य स्रोत है तथा दो दलहनी चारे की फसलों से प्राप्त, दाने से प्राप्त प्रोटीन दाने से सस्ती होती है। कम लागत में दुधारू पशुओं को पौष्टिक तत्व प्रदान करने के लिए हरा चारा पशुओं को खिलाना जरूरी हो जाता है। दाना मिश्रण के अलावा संतुलित आहार हेतु चारे की पौष्टिकता का अलग महत्व है, अतः हमें चारे की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। जहाँ हम हरे चारे से पशुओं के स्वास्थय एवं उत्पादन ठीक रख सकते हैं वहीं दाना व अन्य कीमत खाद्यान की मात्रा को कम करके पशु आहार की लागत में भी बचत कर सकते हैं। 

 पशुओं में हरे चारे का होना अत्यंत आवश्यक है। यदि किसान चाहते हैं कि उनके पशु स्वस्थ्य रहें व उनसे दूध एवं मांस का अधिक उत्पादन मिले तो उनके आहार में वर्ष भर हरे चारे को शामिल करना चांहिये। मुलायम व स्वादिष्ट होने के साथ-साथ हरे चारे सुपाच्य भी होते हैं। इसके अतिरिक्त इनमें विभिन्न पौष्टिक तत्व पर्याप्त मात्रा में होते हैं। जिनसे पशुओं की दूध देने की क्षमता बढ़ जाती है और खेती में काम करने वाले पशुओं की कार्यशक्ति भी बढ़ती है। दाने की अपेक्षा हरे चारे से पौष्टिक तत्व कम खर्च पर मिल सकते हैं। हरे चारे से पशुओं को विटामिन ए का मुख्य तत्व केरोटिन काफी मात्रा में मिल जाता है। हरे चारे के अभाव में पशुओं को विटामिन ए प्राप्त नहीं हो सकेगा और इससे दूध उत्पादन में भारी कमी आ जाएगी, साथ ही पशु विभिन्न रोगों से भी ग्रस्त हो जायेगा। 

ये भी पढ़े: गर्मियों में हरे चारे के अभाव में दुधारू पशुओं के लिए चारा 

 गाय व भैंस से प्राप्त बच्चे या तो मृत होंगे या वे अंधे हो जायेंगे और अधिक समय तक जीवित भी नहीं रह सकेंगे। इस प्रकार आप देखते हैं कि पशु आहार में हरे चारे का होना कितना आवश्यक है। साधारणतः किसान भाई अपने पशुओं को वर्ष के कुछ ही महीनों में हरा चारा खिला पते हैं इसका मुख्य कारण यह है कि साल भर हरा चारा पैदा नहीं कर पाते। आमतौर पर उगाये जाने वाले मौसमी चारे मक्का, एम. पी. चरी, ज्वार, बाजरा, लोबिया, ग्वार, बरसीम, जई आदि से सभी किसान भाई परिचित हैं। इस प्रकार के अधिक उपज वाले पौष्टिक उन्नतशील चारों के बीज़ पशुपालन विभाग व राष्ट्रीय बीज निगम द्वारा किसानों को उपलब्ध कराए जाते है जिससे वह अपने कृषि फसल चक्र के अंदर अधिक से अधिक इनका उपयोग करके फायदा उठा सकते हैं जिससे अधिक से अधिक पशुओं के पोषण की पूर्ति हो सके और दूध एवं मांस उत्पादन की ब्रधि में सहायता मिले। 

हरे चारे का महत्व

 

 चारा स्वादिश्ट, रसदार, सुपाच्य तथा दुर्गन्ध रहित होने चाहिए। चारे की फसल थोड़े समय में तैयार होने वाली, अधिक पैदावार देने वाली, कई कटाई वाली होनी चाहिए। फसलों में जल्दी फुटवार होनी चाहिए फसल साइलेज बनाने के लिए उपयुक्त होनी चाहिए तथा जहरीलें पदार्थ रहित होनी चाहिए। हरे चारे की नस्ल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाने योग्य होनी चाहिऐ।

ये भी पढ़े: फसलों की होगी अच्छी कटाई, बस ध्यान रखनी होंगी ये बातें


हरे चारे की मुख्य फसलें

 

 हरे चारे की दो दाल वाली फसलों में मुख्यतः वार्शिक फसल रबी में बरसीम, खरीफ में लोबिया, ग्वार तथा एक दाल वाली फसलों में रबी में जई, सर्दियों की मक्का, खरीफ में मक्का, ज्वार, बाजरा, चरी आदि हैं। तिलहन में सरसों तथा बहुवर्शीय दलहनी फसलों में रिजका, स्टाइलो, राईस बीन आदि, घासों में हाथी, पैरा, गिन्नी, दीनानाथ, मीठा सुडान, रोड, नन्दी, राई, घास आदि मुख्य चारे की घासें हैं। साल में दो बार हरे चारे की तंगी के अवसर आते हैं।

 ये अवसर है- अप्रैल, जून (मानसून प्रारम्भ होने से पहले) तथा नबम्बर, दिसम्बर (मानसून खत्म होने के बाद) जबकि पशुओं में साल भर हरे चारे की जरूरत पड़ती है। चारे उगाने की उचित वैज्ञानिक तकनीक अपना कर पर्याप्त मात्रा में हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। अच्छे उत्पादन के विभिन्न फसल चक्र का चुनाव वहाॅं की जलवायु अथवा मिट्टी की संरचना पर आधारित है। उत्तर में रबी के मौसम में बरसीम, जई, सेंजी, मेथा आदि फसलें आसानी से उगाई जा सकती हैं। दक्षिणी इलाकों में जहां सामान्यतः तापमान 12-15 से. ग्रे. से नीचे नहीं आता ऐसे इलाकों में ज्वार, मक्का, स्टाइलो, बाजरा, हाथी घास, गिनी घास, पैरा घास व चरी आदि उगाये जा सकते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें जैसे सूडान घास, ज्वार, अंजन, ब्ल्यू पैनिक आदि उगाना उत्तम रहता है। हरे चारे हेतु उपयोगी फसलें नीचे दी हुई है।

गंगातीरी गाय कहाँ पाई जाती है और किन विशेषताओं की वजह से जानी जाती है

गंगातीरी गाय कहाँ पाई जाती है और किन विशेषताओं की वजह से जानी जाती है

गंगातीरी गाय की अद्भुत विशेषता के विषय में जानकर आप भौंचक्के हो जाएंगे। यह एक दिन के अंदर दस लीटर से भी अधिक दूध प्रदान करती है। क्या आपने कभी गंगातीरी गाय के विषय में सुना है? यदि आप पशुपालन का व्यवसाय करते होंगे, तो इस गाय के संबंध में आपको भली भांति जानकारी है। दरअसल, यह गाय उत्तर प्रदेश एवं बिहार में काफी मशहूर है। इस गाय की विशेषता के संबंध में जानकर आप पूरी तरह से दंग रह जाएंगे। गंगातीरी गाय रखने वाले लोगों का कहना है, कि यह एक दिन में 10 से 16 लीटर तक दूध प्रदान करती है। इतना ही नहीं, इस गाय की और भी बहुत सारी विशेषताएं हैं, जिसके बारे में हम इस कहानी के जरिए से बताने जा रहे हैं। तो चलिए आज हम इस लेख में गंगातीरी गाय के संबंध में विस्तार पूर्वक जानें। 

गंगातीरी गाय के संबंध में विस्तृत जानकारी

इस प्रजाति की गाय कहाँ कहाँ पाई जाती है

गंगातीरी गाय एक प्रकार से देसी प्रजाति की गाय है। बतादें कि इस नस्ल की गायें अधिकांश उत्तर प्रदेश और बिहार के जनपदों में देखी जाती हैं। यह प्रमुख तौर पर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, वाराणसी, गाजीपुर और बलिया तो वहीं बिहार के रोहतास और भोजपुर जनपद के अंतर्गत पाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश में गंगातीरी गायों की तादात तकरीबन 2 से 2.5 लाख रुपए तक है। यह गाय भी दूसरी आम गायों की भांति ही दिखती है। परंतु, इसे पहचानना काफी ज्यादा आसान रहता है। गंगातीरी नस्ल की गायें भूरे और सफेद रंग की होती हैं। 

ये भी पढ़े: जानें दुनियाभर में मशहूर पुंगनूर गाय की पहचान और विशेषताओं के बारे में

जानें इस गाय की पहचान किस प्रकार की जाती है

दरअसल, हम पहले भी बता चुके हैं, कि गंगातीरी गाय का रंग भूरा और सफेद होता है। इसके अतिरिक्त इन गायों के सिंघ छोटे व नुकीले होते हैं, जो कि दोनों तरफ से फैले होते हैं। वहीं, इस गाय के कान थोड़ी नीचे की ओर झुके होते हैं। इस प्रजाति के जो बैल होते हैं, उनकी ऊंचाई तकरीबन 142 सेन्टमीटर होती है। वहीं, गाय की ऊंचाई की बात की जाए तो 124 सेन्टीमीटर तक होती है।

गंगातीरी गायों का वजन तकरीबन 235-250 किलो तक रहता है। इस नस्ल की गायें बाजार में बेहद ही महंगी बिकती हैं। इनकी कीमत 40 से 60 हजार रुपये तक होती है। यहां ध्यान देने योग्य जो बात है, वह यह कि इन गायों का ख्याल थोड़ा ज्यादा रखने की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि, पर्याप्त आहार न मिलने की स्थिति में यह गायें बीमार भी हो सकती हैं। इस गाय के दूध में फैट तकरीबन 4.9 प्रतिशत तक पाया जाता है। इसका दूध साधारण गायों के मुकाबले ज्यादा कीमतों पर बिकता है।

जानें कांकरेज नस्ल की गाय की कीमत, पालन का तरीका और विशेषताओं के बारे में

जानें कांकरेज नस्ल की गाय की कीमत, पालन का तरीका और विशेषताओं के बारे में

भारत के अंदर बहुत सारी नस्लों की गाय पाई जाती हैं। प्रत्येक नस्ल की गाय की अपनी अपनी खूबियां होती हैं। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे कांकरेज नस्ल की गाय के बारे में। इस नस्ल की गाय राजस्थान और गुजरात में पाई जाती है, जो कि बहुत ही प्रसिद्ध गाय है। बतादें कि यह एक दिन में 10 से 15 लीटर दूध का उत्पादन करती है। कांकरेज गाय देशी नस्ल की गाय होती है। यह भारत के गुजरात एवं राजस्थान राज्य में पाई जाती है। यह गाय देश में अपनी दूध उत्पादन की क्षमता के लिए काफी मशहूर है। इस नस्ल की गाय दिन में 6 से 10 लीटर दूध देती है। कांकरेज नस्ल की गाय और बैल दोनों की ही बाजार में बहुत मांग है। बतादें कि इनका इस्तेमाल दूध के साथ-साथ कृषि कार्यों के लिए भी किया जाता है। इसे लोकल भाषा में बोनाई, तलबाडा, वागडिया, वागड़ और नागर आदि नामों से जाना जाता है। चलिए आज हम आपको कांकरेज नस्ल की इस गाय से संबंधित विशेषताओं के विषय में बताते हैं। 

कांकरेज गाय की कितनी कीमत होती है

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि इन गायों की कीमत बाजार में सामान्य तौर पर उम्र और नस्ल के आधार पर निर्धारित की जाती है। बाजार में इस गाय की कीमत 25 हजार रुपये से लेकर 75 हजार रुपये तक की है। बहुत सारे राज्यों में इसकी कीमत और भी अधिक होती है।

ये भी पढ़ें:
जानें सबसे छोटी नस्ल की वेचुर गाय की विशेषताओं के बारे में

कांकरेज गाय का किस प्रकार पालन किया जाता है

कांकरेज गायों को गर्भ के दौरान विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। इस दौरान इसे रोगों से संरक्षण के लिए वक्त - वक्त पर टीकाकरण की आवश्यकता होती रहती है। इससे बछड़े बेहतर एवं स्वस्थ पैदा होते हैं। साथ ही, दूध की पैदावार भी काफी ज्यादा होती है। 

कांकरेज गाय की खासियतें

कांकरेज नस्ल की गायें एक महीने में औसतन 1730 लीटर तक दूध प्रदान करती है। इस गाय के दूध में वसा 2.9 और 4.2 प्रतिशत के मध्य विघमान रहता है। इसके वयस्क बच्चों की लंबाई 25 सेमी है, जबकि वयस्क बैल की औसत ऊंचाई 158 सेमी होती है। इन गायों का वजन 320 से 370 किलोग्राम तक होता है। कांकरेज नस्ल के मवेशी सिल्वर-ग्रे एवं आयरन ग्रे रंग के होते हैं। इसका खान-पान बेहद ही अच्छा होता है। इन गायों के लिए पर्याप्त चारे, पानी, खली और चोकर की बेहद जरूरत होती है।

पशुओं को साइलेज चारा खिलाने से दूध देने की क्षमता बढ़ेगी

पशुओं को साइलेज चारा खिलाने से दूध देने की क्षमता बढ़ेगी

गाय-भैंस का दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए आप साइलेज चारे को एक बार अवश्य खिलाएं। परंतु, इसके लिए आपको नीचे लेख में प्रदान की गई जानकारियों का ध्यान रखना होगा। पशुओं से हर दिन समुचित मात्रा में दूध पाने के लिए उन्हें सही ढ़ंग से चारा खिलाना बेहद आवश्यक होता है। इसके लिए किसान भाई बाजार में विभिन्न प्रकार के उत्पादों को खरीदकर लाते हैं एवं अपने पशुओं को खिलाते हैं। यदि देखा जाए तो इस कार्य के लिए उन्हें ज्यादा धन खर्च करना होता है। इतना कुछ करने के पश्चात किसानों को पशुओं से ज्यादा मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं मिल पाता है।

 यदि आप भी अपने पशुओं के कम दूध देने से निराश हो गए हैं, तो घबराने की कोई जरूरत नहीं है। आज हम आपके लिए ऐसा चारा लेकर आए हैं, जिसको समुचित मात्रा में खिलाने से पशुओं की दूध देने की क्षमता प्रति दिन बढ़ेगी। दरअसल, हम साइलेज चारे की बात कर रहे हैं। जानकारी के लिए बतादें, कि यह चारा मवेशियों के अंदर पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के साथ ही दूध देने की क्षमता को भी बढ़ाता है। 

कौन से मवेशी को कितना चारा खिलाना चाहिए

ऐसे में आपके दिमाग में आ रहा होगा कि क्या पशुओं को यह साइलेज चारा भरपूर मात्रा में खिलाएंगे तो अच्छी पैदावार मिलेगी। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ऐसा करना सही नहीं है। इससे आपके मवेशियों के स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए ध्यान रहे कि जिस किसी भी दुधारू पशु का औसतन वजन 550 किलोग्राम तक हो। उस पशु को साइलेज चारा केवल 25 किलोग्राम की मात्रा तक ही खिलाना चाहिए। वैसे तो यह चारा हर एक तरह के पशुओं को खिलाया जा सकता है। परंतु, छोटे और कमजोर मवेशियों के इस चारे के एक हिस्से में सूखा चारा मिलाकर देना चाहिए। 

ये भी पढ़े: भारतीय स्टेट बैंक दुधारू पशु खरीदने के लिए किसानों को देगा लोन

साइलेज चारे में कितने प्रतिशत पोषण की मात्रा होती है

जानकारी के अनुसार, साइलेज चारे में 85 से लेकर 90 प्रतिशत तक हरे चारे के पोषक तत्व विघमान होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें विभिन्न प्रकार के पोषण पाए जाते हैं, जो पशुओं के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। 

साइलेज तैयार करने के लिए इन उत्पादों का उपयोग

अगर आप अपने घर में इस चारे को बनाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको दाने वाली फसलें जैसे कि ज्वार, जौ, बाजरा, मक्का आदि की आवश्यकता पड़ेगी। इसमें पशुओं की सेहत के लिए कार्बोहाइड्रेट अच्छी मात्रा में होते हैं। इसे तैयार करने के लिए आपको साफ स्थान का चयन करना पड़ेगा। साथ ही, साइलेज बनाने के लिए गड्ढे ऊंचे स्थान पर बनाएं, जिससे बारिश का पानी बेहतर ढ़ंग से निकल सके। 

गाय-भैंस कितना दूध प्रदान करती हैं

अगर आप नियमित मात्रा में अपने पशु को साइलेज चारे का सेवन करने के लिए देते हैं, तो आप अपने पशु मतलब कि गाय-भैंस से प्रति दिन बाल्टी भरकर दूध की मात्रा प्राप्त कर सकते हैं। अथवा फिर इससे भी कहीं ज्यादा दूध प्राप्त किया जा सकता है।

बरसात के मौसम में बकरियों की इस तरह करें देखभाल | Goat Farming

बरसात के मौसम में बकरियों की इस तरह करें देखभाल | Goat Farming

बरसात में बकरियों का विशेष रूप से ख्याल रखना पड़ता है। इस मौसम में उनको बीमार होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसलिए आज हम आपको इस लेख में बताएंगे कि आप बारिश के दिनों में कैसे अपनी बकरी की देखभाल करें। गांव में गाय-भैंस की भांति बकरी पालने का भी चलन आम है। आज के वक्त में बहुत सारे लोग बकरी पालन से प्रति वर्ष मोटी आमदनी करने में सफल हैं। हालांकि, बरसात के दौरान बकरियों को बहुत सारे गंभीर रोग पकड़ने का खतरा रहता है। इस वजह से इस मौसम में पशुपालकों द्वारा उनका विशेष ख्याल रखा जाता है। आज हम आपको यह बताएंगे कि बरसात में बकरियों की देखभाल किस तरह की जा सकती है। 

बकरियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें

पशुपालन विभाग द्वारा जारी सुझावों के मुताबिक, बरसात में बकरियों को जल से भरे गड्ढों अथवा खोदे हुए इलाकों से दूर रखें ताकि वे फंस न जाएं। बारिश से बचाने के लिए उन्हें घर से बाहर भी शेड के नीचे रखें। क्योंकि पानी में भीगने से उनकी सेहत पर काफी दुष्प्रभाव पड़ सकता है। 

ये भी पढ़े: बकरी पालन व्यवसाय में है पैसा ही पैसा

बकरियों के लिए चारा-जल इत्यादि की उचित व्यवस्था करें

बरसात के समय, बकरियों के लिए स्वच्छ पानी मुहैय्या कराएं। अगर वे बाहर रहते हैं, तो उनके लिए छत के नीचे पानी की व्यवस्था करें। जिससे कि वे ठंड और बरसात से बच सकें। आपको उन्हें स्वच्छ एवं सुरक्षित भोजन भी प्रदान करना होगा। बरसात में आप चारा, घास अथवा अन्य विशेष आहार उनको प्रदान कर सकते हैं। 

बकरियों के आसपास स्वच्छता का विशेष बनाए रखें

बरसात में इस बात का ध्यान रखें, कि बकरियों के आसपास की स्वच्छता कायम रहे। उनके लिए स्थायी अथवा अस्थायी शेल्टर का भी उपयोग करें, जिससे कि वे ठंड और नमी से बच सकें। 

ये भी पढ़े: बकरी पालन और नवजात मेमने की देखभाल में रखे यह सावधानियां (goat rearing and newborn lamb care) in Hindi

बकरियों का टीकाकरण कराऐं

बकरियों के स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए उनको नियमित तौर पर वैक्सीनेशन उपलब्ध कराएं। इसके लिए पशु चिकित्सक से सलाह भी लें एवं उन्हें बकरियों के लिए अनुशासनिक टीकाकरण अनुसूची बनाने की बात कही है।

सरकार द्वारा जारी पांच एप जो बकरी पालन में बेहद मददगार साबित होंगे

सरकार द्वारा जारी पांच एप जो बकरी पालन में बेहद मददगार साबित होंगे

बकरी पालन एक लाभकारी व्यवसाय है। अगर आप भी वैज्ञानिकों की सलाह के अनुरूप अच्छी नस्ल की बकरी का पालन करना चाहते हैं, तो ये 5 मोबाइल एप आपकी सहायता करेंगे। ये ऐप 4 भाषाओं में मौजूद हैं। किसान भाई खेती के साथ-साथ पशुपालन भी हमेशा से करते आ रहे हैं। परंतु, कुछ ऐसे किसान भी हैं, जो अपनी आर्थिक तंगी की वजह से गाय-भैंस जैसे बड़े-बड़े पशुओं का पालन नहीं कर पाते हैं। इसलिए वह मुर्गी पालन और बकरी पालन आदि करते हैं। भारतीय बाजार में इनकी मांग भी वर्षभर बनी रहती है। यदि देखा जाए तो किसानों के द्वारा बकरी पालन सबसे ज्यादा किया जाता है। यदि आप भी छोटे पशु मतलब कि बकरी पालन (Goat Farming) से बेहतरीन मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो आपको नवीन तकनीकों की सहायता से इनका पालन करना चाहिए। साथ ही, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (Central Goat Research Institute) के द्वारा निर्मित बकरी पालन से जुड़े कुछ बेहतरीन मोबाइल ऐप का उपयोग कर आप अच्छे से बकरी पालन कर सकते हैं। इन ऐप्स में वैज्ञानिक बकरी पालन, बकरियों का सही प्रबंधन, उत्पादन एवं कीमत आदि की जानकारी विस्तार से साझा की गई है।

बकरी पालन से संबंधित पांच महत्वपूर्ण एप

बकरी गर्भाधान सेतु

बकरी की नस्ल में सुधार करने के लिए बकरी गर्भाधान सेतु एप को निर्मित किया गया है। इस एप में वैज्ञानिक प्रोसेस से बकरी पालन की जानकारी प्रदान की गई है।

गोट ब्रीड ऐप

यह एप बकरियों की बहुत सारी नस्लों की जानकारी के विषय में विस्तार से बताता है, ताकि आप बेहतरीन नस्ल की बकरी का पालन कर उससे अपना एक अच्छा-खासा व्यवसाय खड़ा कर पाएं।

गोट फार्मिंग ऐप

यह एप लगभग 4 भाषाओं (हिंदी, तमिल, कन्नड़ और अंग्रेजी) में है। इसमें बकरी पालन से जुड़ी नवीन तकनीकों के विषय में बताया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें देसी नस्ल की बकरी, प्रजनन प्रबंधन, बकरी की उम्र के हिसाब से डाइट, बकरी का चारा, रखरखाव एवं देखभाल के साथ-साथ मांस और दूध उत्पादन आदि की जानकारी के विषय में जानकारी प्रदान की गई है।

बकरी उत्पाद ऐप

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस एप के अंदर बाजार में कौन-कौन की बकरियों की मूल्य वर्धित उत्पादों की बाजार में मांग। साथ ही, कैसे बाजार में इससे अच्छा मुनाफा उठा सकते हैं। यह एप भी हिंदी, तमिल, कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है।

बकरी मित्र

इस एप में बकरियों के प्रजनन प्रबंधन, मार्केटिंग, आश्रय, पोषण प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन एवं खान-पान से संबंधित जानकारी प्रदान की जाती है। साथ ही, इसमें बकरी पालन के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें किसानों की सहायता के लिए कॉल की सुविधा भी दी गई है। जिससे कि किसान वैज्ञानिकों से बात कर बेहतर ढ़ंग से बकरी पालन कर सकें। बकरी मित्र एप को विशेषतौर पर यूपी एवं बिहार के किसानों के लिए तैयार किया गया है।
शेर से भी लड़ सकती है यह भैंस, साधारण भैंस से कहीं ज्यादा देती है दूध।

शेर से भी लड़ सकती है यह भैंस, साधारण भैंस से कहीं ज्यादा देती है दूध।

देश की सुदृढ़अर्थव्यवस्था के लिए खेती करने के साथ-साथ पशुपालन का भी बहुत ही अहम योगदान होता है। किसान खेती के साथ-साथ बड़ी संख्या में गाय भैंस और बकरी का पालन करके अच्छी खासी आमदनी प्राप्त करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन से किसानों को बहुत ही फायदा होता है। किसान गाय, भैंस और बकरी का दूध बेचकर बढ़िया मुनाफा अर्जित करते हैं। जाफराबादी नस्ल की भैंस आजकल किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय है, यह भैंस अपनी ताकत और दूध देने की क्षमता के लिए काफी प्रसिद्ध है। मजबूत कद काठी वाली यह भैंस अधिक मात्रा में दूध देती है, इस के दूध में 8% से भी अधिक पोषण होता है, जिससे पीने वाले के शरीर को मजबूती मिलती है। माना तो यह भी जाता है, कि इस भैंस के अंदर इतनी ताकत होती है, कि यह शेरों से भी भिड़ सकती है।


ये भी पढ़ें:
भेड़, बकरी, सुअर और मुर्गी पालन के लिए मिलेगी 50% सब्सिडी, जानिए पूरी जानकारी

इस नस्ल की भैंस मुख्य तौर पर गुजरात में पाई जाती हैं।

गुजरात के गिर जंगलों से ताल्लुक रखने वाला जफराबादी नस्ल की यह भैंस रोजाना 30 से 35 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है यानी हर महीने यह भैंस हजार लीटर से भी ज्यादा दूध देती है। दूध का व्यापार करने वाले किसानों के लिए जाफराबादी भैंस काफी उपयुक्त मानी जाती है। जो किसान डेयरी का काम करते हैं, उनके लिए इस नस्ल की भैंस अच्छी कमाई का स्रोत बन सकती है। पशु पालन करने वाले किसानों के लिए सरकार के द्वारा आर्थिक सहायता भी दी जाती है। यह भैंस सबसे अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए जानी जाती है, इस के दूध में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी होती है। डेरी फार्मिंग छोटे/सीमांत किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए सहायक आय का एक अनिवार्य स्रोत है। दूध के अलावा जानवरों की खाद मिट्टी की उर्वरकता और फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए कार्बनिक पदार्थों का एक अच्छा स्रोत माना जाता है। भैंस फार्म का संचालन करना लगभग सभी मसौदा शक्ति की आपूर्ति करते हैं, क्योंकि कृषि अधिकतर आवधिक होती है। इसीलिए भैंस डेयरी फार्मिंग के माध्यम से अनेक व्यक्तियों को रोजगार मिलने की संभावना अधिक रहती है। जो किसान इस नस्ल की भैंस का पालन करके डेयरी व्यवसाय के माध्यम से अच्छी खासी आय अर्जित करना चाहते हैं। उन्हें अपने नजदीकी डेयरी फार्म और कृषि विश्वविद्यालय/ सैनी डेयरी फार्मों का दौरा करना चाहिए और डेयरी फार्मिंग की लाभप्रदता पर चर्चा करनी चाहिए। क्योंकि इस तरह के नस्लों वाली भैंस को पालने के लिए एक अच्छा व्यवहारिक प्रशिक्षण और विशेषज्ञता अत्यधिक जरूरी होती है।


ये भी पढ़ें:
भैंस पालन से भी किसान कमा सकते हैं बड़ा मुनाफा
जाफराबादी भैंस का विशेष तौर पर ख्याल रखना होता है, इसके आहार और आराम का ख्याल रखना बेहद जरूरी माना जाता है। जो किसान इस नस्ल की भैंस का पालन करते हैं, उन्हें इसके आहार में संतुलन बनाए रखना अनिवार्य होता है। तोजो किसान पशुपालन में अपनी रुचि रखते हैं, उन्हें जाफराबादी नस्ल के भैंस को जरूर पालना चाहिए। मजबूत कद काठी वाली यह भैंस 1 महीने में हजार लीटर से भी ज्यादा दूध देती है। किसान इस भैंस का दूध निकाल कर डायरेक्ट बाजार में बेचकर बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं, इसके बच्चे भी बहुत ही जल्दी तैयार हो जाते है। इन्हें भी बेचकर किसान बढ़िया मुनाफा अर्जित कर सकते हैं, कुल मिलाकर बात करें तो जाफराबादी भैंस के पालने से आप लाखों का मुनाफा अर्जित कर सकते हैं।
इस योजना से मिलेगा इतने लाख लोगों को रोजगार का अवसर 50 प्रतिशत अनुदान भी

इस योजना से मिलेगा इतने लाख लोगों को रोजगार का अवसर 50 प्रतिशत अनुदान भी

यदि पशुपालन तथा डेयरी फार्मिंग के व्यवसाय में कुछ खास करने में रुचि रखते हैं, तो आपके लिए एक खुशखबरी है। शीघ्र ही सरकार 50 लाख से अधिक किसानों को इस व्यवसाय हेतु सब्सिडी प्रदान करने जा रही है। कृषि के उपरांत पशुपालन तथा डेयरी व्यवसाय द्वारा कृषकों की आय में बढ़ोत्तरी का कार्य किया है। डेयरी के क्षेत्र में निरंतर बढ़ते फायदे को देखते हुए फिलहाल शहरों से युवा एवं प्रोफेशनल इस व्यवसाय से जुड़ते जा रहे हैं। दूध एवं डेयरी उत्पाद की बढ़ती मांग द्वारा इस व्यवसाय के सफलता का मार्ग प्रसस्त कर दिया है। बतादें, कि इस व्यवसाय के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को रोजगार का अवसर प्राप्त होगा इसके लिए सरकार विभिन्न योजनाओं पर कार्य कर रही है।
ये भी पढ़े: ये राज्य सरकार दे रही है पशुओं की खरीद पर भारी सब्सिडी, महिलाओं को 90% तक मिल सकता है अनुदान
अब शीघ्र ही इस व्यवसाय हेतु कृषकों को 50% प्रतिशत अनुदान भी प्रदान करवाएगी। केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने जानकारी देते हुए बताया है, कि देश के युवा एवं किसान वर्तमान में सरकार द्वारा इस योजना का फायदा लेकर अपना स्वयं का व्यवसाय आरंभ कर सकते हैं।

किस तरह का व्यवसाय शुरू किया जाए

कोरोना महामारी के उपरांत से ही खेती किसानी एवं डेयरी क्षेत्र में नवीन स्टार्टअप एवं व्यवसाय देखने को मिले हैं। इन्हीं प्रयासों को देखते हुए वर्तमान में सरकार द्वारा आर्थिक सहायता की तैयारी कर दी है। दूध-डेयरी को प्रोत्साहन देने वाली राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना के चलते सुअर, मुर्गी, गाय, भैंस एवं बकरी का ब्रीडिंग फार्म खोलने हेतु अत्यधिक साइलेज यूनिट्स निर्माण हेतु सरकार 50% अनुदान देने जा रही है। अगर आपके डेयरी अथवा पशुपालन से संबंधित व्यवसाय में 50 लाख से लेकर 60 लाख, 1 करोड़ एवं 4 करोड़ व्यय किये जा चुके हैं, तो आपको आधार धनराशि सरकार मुहैय्या कराएगी। इससे संबंधित व्यवसाय हेतु आप कर्ज भी प्राप्त करेंगे तो AHIDF Scheme से प्रीमियम पर 3% प्रतिशत तक की छूट भी प्रदान की जाएगी।

आप किस प्रकार बन सकते हैं आत्मनिर्भर

मीडिया खबरों के अनुसार, केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने कहा है, कि मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी क्षेत्र में सरकार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से 50 लाख से अधिक लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए तैयार है। इस क्षेत्र में स्वयं का व्यवसाय अथवा स्टार्ट अप करने एवं युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सरकार निरंतर कोशिश किए जा रही है।

राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना से क्या लाभ होगा

संजीव बालियान ने कहा कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन योजना के जरिये देसी नस्ल की गाय के पालन-पोषण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी योजना के चलते पशुओं के इलाज हेतु सरकार द्वारा फिलहाल 4332 से ज्यादा पशु मेडिकल यूनिट भी स्थापित करने की तैयारी की है। युवा, किसान अथवा कोई भी प्रोफेशनल वर्तमान में मंत्रालय की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाकर के इस संबंध में ज्यादा जानकारी ले सकते हैं।
जाने किस व्यवसाय के लिए मध्य प्रदेश सरकार दे रही है 10 लाख तक का लोन

जाने किस व्यवसाय के लिए मध्य प्रदेश सरकार दे रही है 10 लाख तक का लोन

हमारे देश में दूध की बहुत मांग है। अलग अलग तरह के डेयरी प्रोडक्ट्स भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। दूध को प्रोटीन और कैल्शियम का एक अच्छा सोर्स मानते हैं। इसी डिमांड का नतीजा है, कि आजकल बहुत सी जगह किसानों ने खेती के साथ-साथ पशुपालन का व्यवसाय अपनाना शुरू कर दिया है। इस काम में किसान इसलिए लगे हुए हैं। क्योंकि पशुपालन-डेयरी फार्मिंग से अतिरिक्त आमदनी हो ही जाती है। खेत के लिए खाद का इंतजाम भी हो जाता है। अब सरकार भी किसानों को इस काम में आर्थिक और तकनीकी सहयोग दे रही है। बहुत ही राज्य सरकार किसानों को इस व्यवसाय से जुड़ने के लिए जागरूक कर रही है। इसी पहल में मध्य प्रदेश सरकार भी आगे आई है। सरकार ने अपने राज्य में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए ऐसे किसानों को ₹1000000 लोन देने की एक स्कीम निकाली है। जो पशुपालन भी करते हैं, किसान बहुत ही आसान प्रक्रिया अपनाते हुए इस स्कीम के तहत लाभ उठा सकते हैं।

क्या है ये योजना

कुछ समय पहले ही मध्य प्रदेश राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ एक एमओयू (EOU) साइन किया है। इस एमओयू (EOU) का मकसद राज्य में दूध के उत्पादन को बढ़ाना है। सरकार ने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ही राज्य के किसानों और पशुपालकों को किसी भी तरह का दुधारू पशु खरीदने के लिए 1000000 रुपए तक की लोन राशि देने की बात की है। पशुपालकों को यह लोन राशि देते समय सरकार किसी भी तरह की गारंटी नहीं मांग रही है। योजना के आधार पर समझ आता है, कि इस स्कीम से छोटे और मझोले किसानों को भी काफी लाभ होगा। ज्यादातर छोटे किसान साथ में पशुपालन करना चाहते हैं। क्योंकि उनकी खेती की जमीन उतनी ज्यादा नहीं होती है, कि वह उससे बहुत ज्यादा मुनाफा कमा सकें। साथ ही, धनराशि के अभाव में वह कुछ नया भी नहीं कर पाते हैं और इस आर्थिक रेस में बहुत पीछे रह जाते हैं। ऐसे ही किसानों को आर्थिक बल देने के लिए और राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है।

कैसे कर सकते हैं लोन का भुगतान

एमपी स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बीच हुए इस एमओयू के अनुसार, किसान और पशुपालकों को 2 मवेशियों से लेकर, 4, 6 और 8 की संख्या में मवेशी खरीदने की छूट दी जाएगी। जिसके लिए वो अपने जिले में चिन्हित 3 से 4 बैंक की शाखाओं में लोन के लिए आवेदन कर पाएंगे। इस स्कीम के तहत दस लाख तक का मुद्रा लोन और ₹60000 तक का लोन मुद्रा लोन किसानों को दिया जाएगा। किसान इस मुद्रा की वदल में 10% तक की मार्जिन मनी जमा करवाते हैं। अच्छी बात यह है, कि लोन की रकम को चुकाने के लिए कैसा भी दवाब नहीं होगा। बल्कि किसान चाहें तो 36 किस्तों में लोन की रकम का भुगतान कर सकते हैं।

किन-किन चीजों के लिए मिलता है लोन

वैसे तो देश में पशुपालन और डेयरी फार्मिंग के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिससे किसानों और पशुपालकों को आर्थिक संबल मिला है। इन सबके अलावा भी सरकार द्वारा कई तरह की अन्य व्यवसाई योजनाओं के लिए फंड जारी किया जाता है। कई योजनाओं में आवेदन करने पर केंद्रीय पशुपालन, मत्स्य पालन और डेयरी मंत्रालय से फंड जारी होता है। तो कुछ परियोजनाओं में नाबार्ड का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग मिलता है।
ये भी देखें: मत्स्य पालन की पूरी जानकारी (Fish Farming information in Hindi)
इस कड़ी में अब एमपी स्टेट कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन के साथ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भी आगे आया है। एसबीआई की ओर से मिल्क कलेक्शन यूनिट के निर्माण से लेकर ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीन, मिल्क कलेक्शन सिस्टम, मिल्क ट्रांसपोर्ट वैन आदि के लिए भी लोन दिया जाता है। इस तरह के लोन में हमेशा ही लोन की ब्याज दर भी नियम और शर्तों के आधार पर ही निर्धारित की जाती है। यह दरें ज्यादातर 10% से लेकर 24% तक होती हैं। इन योजनाओं में आवेदन करने के लिए अपने जिले के पशुपालन विज्ञान, कृषि विज्ञान केंद्र या पशु चिकित्सालय में भी संपर्क कर सकते हैं।
350 करोड़ में यह सरकार 70% तक बढ़ाएगी दूध का उत्पादन, आपके लिए भी हो सकती है खुशखबरी

350 करोड़ में यह सरकार 70% तक बढ़ाएगी दूध का उत्पादन, आपके लिए भी हो सकती है खुशखबरी

आजकल किसानी और पशुपालन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पशुओं का ज्यादा पालन दूध उत्पादन के लिए किया जाता है। आजकल बाज़ार में दूध और उससे बने उत्पादों की डिमांड ज्यादा होने के कारण भारत की बड़ी आबादी दुग्ध उत्पादन से जुड़ी हुई है। लगभग देश भर में हर सरकार दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाती हैं। पशुपालकों की मदद करने के लिए सरकारें बहुत से कदम उठा रही हैं। जहां कई जगह पर किसानों को पशु खरीदने के लिए अनुदान राशि और लोन दिया जा रहा है। वहीं पर बहुत जगह पशुओं का बीमा भी किया जा रहा है। इसके अलावा डेयरी फार्मिंग के लिए सरकारें सब्सिडी भी देती हैं। दुग्ध उत्पादन के कारोबार में देश की एक और राज्य सरकार बड़ा कदम उठाने जा रही है। इससे राज्य में रहने वाले सभी लोगों को इस योजना से काफी फायदा होने वाला है।

जम्मू कश्मीर में डेयरी क्षेत्र के विकास के लिए दिया जाएगा 350 करोड़

डेयरी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए जम्मू कश्मीर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। जम्मू कश्मीर सरकार ने अगले 5 साल में डेयरी क्षेत्र को विकसित करने के लिए 350 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव तैयार किया है। इस पैसे की मदद से दुग्ध उत्पादन को अच्छी तरह से बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से तैयारी की जाएगी। माना जा रहा है, कि राज्य सरकार सीधा पशुपालकों से खुल को जोड़कर स्कीम के तहत काम करेगी।

रोजगार के भी बढ़ेंगे अवसर

जम्मू कश्मीर सरकार राज्य के युवाओं को रोजगार देने की कवायद भी कर रही है। इस नई योजना के अनुसार, दुग्ध उत्पादन में 16,000 युवाओं को नौकरियां मिलेंगी। माना जा रहा है, कि यह ऐसी योजना है, कि इसका सीधा-सीधा लाभ आम जनता को मिलेगा।
ये भी देखें: बिना गाय और भैंस पालें शुरू करें अपना डेयरी सेंटर

दुग्ध उत्पादन बढ़ावा देने को मंजूरी

जम्मू कश्मीर सरकार पहले भी पशु पालकों की मदद करती रही है और अभी योजना के तहत माना जा रहा है। अगले 5 साल में जम्मू-कश्मीर में दूध का उत्पादन लगभग 70% तक बढ़ जाएगा।